अमृता प्रीतम की रचनाएँ बनी औरतों की आवाज़

Amrita Pritam

अमृता कौर प्रीतम हिन्दी व पंजाबी साहित्य जगत का एक ऐसा नाम जिसने अपनी लेखनी के द्वारा नारी सामर्थ्य का एक इतिहास रचा. समाज की रूढ़िवादी कट्टरता और आडम्बरों के कांटों को लांघ कर सफलता के फूल खिलाए. पंजाबी साहित्य की यह पहली महिला लेखिका सामाजिक अत्याचार के खिलाफ औरतों की आवाज़ बनीं और उस आवाज़ को उन्होंनें अपने लेखों के द्वारा लोगों तक पहुँचाया.

अमृता प्रीतम के शब्दों में  

“जब कोई पुरुष महिलाओं की शक्तियों से इन्कार करता है तो वह अपने अपचेतन से इन्कार करता है”.

1919 में पंजाब के गुजरांवाला में जन्मीं अमृता प्रीतम का बचपन माँ-बाप के अभाव में क़लम व किताबों के बीच बीता. माँ-बाप का साया ढूंढती हुई आँखें जब छलक आती थीं, तब उन्हें पोछनें वाला कोई न होता था. अपनी तन्हाई को दर्शाते हुए उन्होंनें कहा

“ज़िन्दगी एक रात थी हम तो जागते रहे, किस्मत को नींद आ गई”.

शब्दों के साथ खेलते-खेलते वह उन्हें पिरोकर रचना की ख़ूबसूरत माला बनानें लगीं और 16 वर्ष की नन्हीं उम्र में अमृता प्रीतम का पहला काव्य संग्रह ‘अमृत लहरें (1936)’ प्रकाशित हुआ और देखते ही देखते उपन्यास, कहानी, निबन्ध जैसी रचनाओं द्वारा उन्होंने अपनी नाम की जोत सारे संसार में रोशन की.

महिलाओं की समकालीन दुर्गती व दयनीय अवस्था का शोकविभोर वर्णन करने के लिए और समाज का घ्रणित चेहरा दिखाने के लिए उन्होंने ‘पिंजर (1950)’ नामक उपन्यास की रचना की, और इस कड़वे सत्य से सबको अवगत कराया. साथ ही साथ स्त्री के अस्तित्व पर उठने वाले सवालों के आड़े आकर उसकी शक्ति और बल को प्रमाणित किया.

अमृता प्रीतम नें भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के भीषण व आत्मा को दहलाने वाले द्रश्यों का अनुभव किया और उसका सजीव चित्रण अपनी रचना ‘अज्ज आखाँ वारिस शाह नूं’ में किया जिसकी हर एक पंक्ति उन पलों को दोबारा ज़िन्दा कर देती है.

शब्दों में प्राण भरने वाले अन्दाज़ नें अमृता प्रीतम को 20वीं सदी की सबसे लोकप्रिय लेखकों में से एक बनाया और बुराइयों से लड़ने वाले स्वभाव नें उनको महिला समाज का प्रतिनिधि. समाज नें सदैव ही औरत को एक वस्तु मात्र समझा, उसकी पवित्रता को उसकी मन की सुन्दरता से जोड़ने के बजाय औरत के तन से जोड़ दिया और जब चाहा जहाँ चाहा उसका साथ छोड़ दिया. दुनिया की इन सभी कूप्रथाओं पर अमृता प्रीतम नें अपनी क़लम को हथियार बनाकर वार किया और वास्तविकता का दर्पण दिखलाया.

मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी 

सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था

फिर समुन्द्र को खुदा जाने 
क्या ख्याल आया 
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी 
मेरे हाथों में थमाई 

और हंस कर कुछ दूर हो गया…

क़दमों में निरन्तर बढ़ते रहनें की लगन और सीने में लक्ष्य को पाने के जज़्बे नें उन्हें साहित्य के संसार का एक ऐसा चमकता हुआ सितारा बनाया जिसनें कठिनाइयों की आग में जल-जल कर चमकना सीखा.

यह आग तो उनके सीने में किशोरावस्था से ही दहक उठी थी, परन्तु उन्होंनें इस सांसारिक अन्धकार को छोड़कर स्वर्ग का आनन्द भोगनें का निश्चय किया और 2005 में अनन्त सुख की किरणों में विलुप्त हो गईं और हमारे लिए छोड़ गईं अपना बहुमूल्य खज़ाना.

अमृता प्रीतम नें बचपन से ही संसार में ऊँच-नींच और भेद-भाव की सरहदें देखीं. मनुष्य के सामनें खड़ी जाति-धर्म की दीवार देखी और स्त्री-पुरुष के बीच पक्षपात की कांटों भरी तार देखी, पर देखा एक सपना समानता का भी. बाल्यकाल में घर से जात-पात को मिटाया और युवावस्था में संसार से ऊँच-नीच को. परन्तु शायद लोग जीवन का भ्रष्ट रूप देखने के ही आदी हो चुके हैं. आख़िर क्यों इन बुराइयों के बीज बोए जाते हैं और क्यों हर सदी में किसी न किसी अमृता प्रीतम को औरत की सार्थकता और महत्ता को प्रमाणित करने की आवश्यकता पड़ती है? क्या उनका इंसान होना काफी नहीं क्या सच में नहीं…….????

Gulafsha Khan

   

 

 

  

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