आओ तुमको सफर ए औरत पर ले चलूँ

तुम को सैर कराऊँ मैं एक बला की,
आओ तुमको सफर ए औरत पर ले चलूँ,
तुम छोड़ो यार सदियों का खूबसूरत फ़लसफ़ा,
आओ तुमको सच्चे सफर पर ले चलूँ,

तुमने देखी है ज़ुल्फ़ की बदलियां तो क्या,
थाम मुट्ठी में जो खिंचते हैं साहब, उस दर्द का क्या कहिये,
होता है तमाशा जब घरों में,

उफ्फ!! ज़ुल्फ़ों का क्या कहिये,
सुर्ख लाली ये रुखसार की,
तुमको कब लगती है इतनी प्यारी,
पाश पाश होना कहते हैं किसे,

पूछ लो ज़रा सा बस इनसे,
जो झगड़ो में होती है तब्दील बहस कोई,
हुस्न ए औरत का हश्र बदलता है दर्द ए कहानी में देखो,

यूँ कमर से पकड़ कर कोई जो झकझोर देता है वजूद,
ना रहती है कुछ कसक अधूरी, ना रहता है कुछ अज़ाब दूर,
उज़ू का खूबसूरत सा ज़िक्र,

यूँ होता है जब मरोड़ा जाता है जिस्म,
कोई चीख़ क्यों गर हो गयी प्यारी,
क्यों सिसकियों पे लिखें कहानी कोई,

हुस्न जब रौंदा जाता मर्दानी ताकत तले,
घरों में कहता नही इसे गुनाह कोई,
ये तो होता ज़माने भर में देखो,
इसको कब समझता है बुरा कोई !

Ayman Jamal

1 Response

  1. Danish says:

    हुस्न जब रौंदा जाता मर्दानी ताकत तले,
    घरों में कहता नही इसे गुनाह कोई,
    ये तो होता ज़माने भर में देखो,
    इसको कब समझता है बुरा कोई !
    ek aaina hai ye lafz hamare samaz ka… nazm me ek sikh se jyada bahut kuch haii… bahut umdaah!!!

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