एक नई राह खोज

एक नई राह खोज

 

By Ayman Jamal

एक नई राह खोज,

चल आ के एक नई मंज़िल बनाएं,

 

हर रोज़ वही सुबह ज़ुल्मों की,

हर रोज़ वही शाम ए बेबसी,

हर रोज़ सूरज की लाली वही खूँ भरी,

हर रोज़ चाँद में रात की रोटी ढूंढता गरीब पेट,

 

बस के पत्थर का जिगर ही नही फटता,

बस के कोई चश्मा तब्दीली का नही निकलता,

फिर क्यों न चीर तू ज़मीन का सीना,

फिर क्यों न अपने हक़ का पानी निकाल तू,

 

कब तलक बेबस लाशों के वजूद दफ़नायेगा,

कब तलक ना सिर उठा के आवाज़ लगाएगा,

इंक़लाब का कोई दिन मोहैय्या नही,

तब आजाये जब हद से गुज़र जाए बात कोई,

 

लगा दे दाव पे हर अश्क़, हर दर्द, हर बेबसी,

जीत वो जंग जो हारता आया है तू,

बना जुनूँ को अपना सारथी,

के छल को, कपट को, दे जवाब तू,

 

हो कितना भी छोटा पत्थर,

गिरे जो ऊँचाई से तो कर सके है बर्बादी,

उठ, खड़ा हो, चल उचाईयों को,

के गिरना है तुझे कई कई बार,

 

आज़ाद कर खुद को झूठी आज़ादी से,

जोड़ दे एक सफ़ह इतिहास में बेबाकी का,

तेरी नस्लों को जीने ना मिले ज़िल्लत,

कर कुछ ऐसा के बदल जाए ये मंज़र,

 

ले आ खुदाई को तू ज़मीन पर,

कर दे  फ़ैसला के दूर बहुत है रोज़ ए महशर.

 

एक नई राह खोज,

चल आ के एक नई मंज़िल बनाये.

Ayman Jamal

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