ऐनी आपा: उर्दू साहित्य का एक बड़ा नाम

यह फ़ितरत इंसानी है कि  जब तक हमें कुछ बताया न जाये किसी भी चीज़ पर हम गौर ही नहीं करते. मसलन आसमान और पानी का रंग नीला क्यों है. डूबते और उगते समय सूरज संतरी क्यों होता है. किसी दूसरे को तक़लीफ़ में देख कर वो कुछ-कुछ जो दिल में होने लगता है, वो क्यों होता है. किसी के लिए दिल में नफ़रत और किसी के लिए बेइंतहा मोहब्बत कैसे घर कर जाती है. ऐसी कई चीज़े हैं जिन पर हम कभी नहीं सोचते और न ही हम सोचते हैं उन रास्तों और दरवाज़ों के बारे में जिनसे होकर हम रोज़ पहुँचते हैं अपनी मंज़िल पर.

अब देखिए हम लोग हर रोज़ जामिया के दरवाज़ा नम्बर 4 से गुज़रते हैं पर कभी सोचा नहीं कि इस दरवाज़े में ख़ास क्या है. ऐसा क्या है जो गगनचुम्भी इस दरवाज़े का कद और ऊंचा कर देता है. ऐसा क्या है जो वह ख़ासियत इस दरवाज़े के नाम में छुपा हुआ है.

कभी किसी बड़े शायर ने कहा था कि नाम में क्या रखा है. मगर कभी-कभी कुछ नाम ऐसे भी होते हैं, जिनकी स्याही में डूबी होती है पूरी एक सदी.

ऐसा ही एक नाम है कुर्रतुल ऐन हैदर यानी कि ऐनी आपा. उर्दू साहित्य का यह इतना बड़ा नाम है कि इनके जीवन के किस रंग को छूते हुए बात शुरू की जाए समझ नहीं आ रहा. इसलिए मैं मान कर चलता हूँ कि आप और मैं ऐनी आपा के जीवन पर बनी कोई बाइस्कोप देख रहे हैं.

ऐनी आपा का जन्म उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में हुआ था. उनके पिता ‘सज्जाद हैदर यलदरम’ उर्दू के जाने-माने लेखक होने के साथ-साथ ब्रिटिश शासन के राजदूत की हैसियत से अफगानिस्तान, तुर्की इत्यादि देशों में तैनात रहे थे और उनकी मां ‘नजर’ बिन्ते-बाकिर भी उर्दू की लेखिका थीं. वो बचपन से रईसी व पाश्चात्य संस्कृति में पली-बढ़ीं.

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा लालबाग, लखनऊ , उत्तर प्रदेश में स्थित गाँधी स्कूल से प्राप्त की व तत्पश्चात अलीगढ़ से हाईस्कूल पास किया. लखनऊ के आई.टी. कालेज से बी.ए. व लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. करनें के बाद फिर लन्दन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल में शिक्षा ग्रहण की.

बहुमुखी प्रतिभा की धनी ऐनी आपा ने बहुत कम आयु में लिखना शुरू किया था. उन्होंने अपनी पहली कहानी मात्र छः वर्ष की अल्पायु में ही लिखी थी. ’बी चुहिया‘  उनकी प्रथम प्रकाशित कहानी थी. 1989 ज्ञानपीठ पुरस्कार,  1989 पद्मभूषण प्राप्त करने वाली ऐनी आपा आज़ादी के बाद भारतीय फ़िक्शन का एक स्तंभ मानी गईं.

उन्होंने अपना करियर एक पत्रकार की हैसियत से शुरू किया लेकिन इसी दौरान वे लिखती भी रहीं. उनकी कहानियां, उपन्यास, अनुवाद, रिपोर्ताज़ वग़ैरह सामने आते रहे. वो उर्दू में लिखती और अँग्रेज़ी में पत्रकारिता करती थीं. उनके बहुत से उपन्यासों का अनुवाद अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा में हो चुका है. उनकी दो रचनाओं का अनुवाद जामिया के दो जाने माने रचनाकारों प्रोफ़ेसर असगर वज़ाहत और प्रोफेसर वहाजुद्दीन अलवी साहब ने किया. 

साहित्य अकादमी में उर्दू सलाहकार बोर्ड की वे दो बार सदस्य भी रहीं. विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में वे जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर के रूप से भी जुड़ी रहीं.

प्रोफ़ेसर अब्दुल बिस्मिल्ला बताते हैं कि चूँकि वो हम सबसे बड़ी थीं, इसलिए हम लोग उन्हें ऐनी आपा कहते थे. वो जामिया के ही पास ज़ाकिर बाग़ में किराये पर रहा करती थीं. उनका जामिया से बहुत लगाव था. वो यहाँ उर्दू विभाग में विजिटिंग प्रोफ़ेसर थी और उनके लेक्चर अक्सर जामिया में हुआ करते थे.

मैंने भी उनका एक लेक्चर जामिया में सुना है. जब उनका देहांत हुआ तब हमारे वाइस चांसलर मुर्शीद साहब नें उनके इस्तेमाल की चीज़ों का जामिया के वीसी ऑफिस में एक कमरा लोगों के लिए संग्रहित करवा दिया ताकि लोग उन सब चीज़ों को सदियों तक देख सकें.

हर दिल अज़ीज़ ऐनी आपा पिता के इंतकाल फरमाने के बाद अपने बड़े भाई के साथ पाकिस्तान चली गईं. फिर वहां से लंदन और पिता के ख़ास दोस्त रहे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के कहने पर उन्होंने एक बार फिर रुख़ किया अपने मुल्क हिंदुस्तान की ओर. जिसके बाद वो हमेशा के लिए इस मुल्क की होकर रह गईं. इस दौरान उन्होंने बँटवारे का दर्द भी शब्दों में पिरोया. एक रोज़ ऐसा आया जब वो हम सबको ख़ामोशी से अलविदा कह गयीं. जिसके बाद से आज तक जामिया ने अपने खुबसूरत से दिल में संजोये हुए रखा है.

Ray Bahadur Singh

 

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