भ्रूण हत्या

भ्रूण हत्या

ये दुनियां क्यों ऐसी है

क्यों बेटी दर्द सहती है

वो सिसक-सिसक कर कहती है

माँ तू भी तो एक बेटी है,

 

सुन लो मेरी सोंड़ी बतियां

मत कर माँ, कन्या भ्रूण हत्या,

 

दे दो मुझको जीवनदान

हूँ मैं एक सुन्दर वरदान

मै तो हूँ नन्हीं सी जान

ना कर मुझे ऐसे लहूलुहान,

 

जान लो तुम मेरी अरदास

बेटे की तरह हूँ मैं ज़िन्दगी ख़ास,

 

माँ मुझको दुनिया में आने दो

सपने कई सजाने दो

खुद को हृदयहीन न बनाओ

बेटी की भी कुछ मोहब्बत दिखलाओ,

 

ज़रा देख इस चेहरे की तरफ

इस मासूम ज़िन्दगी पर क्यों आता नहीं तरस,

 

अपने नन्हें-नन्हें पाँव से

तेरे आँगन को स्वर्ग बनाऊंगी

अपने नन्हें-नन्हें हाथों से

तेरा पावन सर दबाऊंगी,

 

मान लो ना कुदरत का क़ानून

चारों ओर है क्यों लाल सुर्ख खून,

 

बनना है बाबा की लाडो

जीना है इस बात को जानो

दादी का प्रेम है पाना मुझको

मानवता की आवाज़ को मानो,

 

कर ले तू सच की पहचान

बेटा-बेटी एक समान,

न देना मुझको दूध मलाई

न मांगू मैं खिलौनें मिठाई

हूँ बेटी तेरी जैसा भाई

क्यों हमेशा बेटी मारना चाही,

 

दहेज़, भेदभाव और शोषण का शिकार

क्या कसूर मेरा जो सहें सामाजिक वार,

 

बुनना है सपने हज़ार

लाना है सफलता की बहार

माना हैं रुकावटें बेशुमार,

 

पर साहस करूँगी इन सब को पार

लक्ष्य के क्यों आड़े आता सिन्दूर

क्या सच में बेटी होना है पाप पूर्ण.

Gulafsha Khan

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