मर्सी किलिंग या इच्छा-मृत्यु  एक गम्भीर समस्या

मर्सी किलिंग या इच्छा-मृत्यु एक गम्भीर समस्या

ज़िन्दगी  एक  ख़ूबसूरत सफऱ है. हर इंसान इस सफ़र को तय करना चाहता है, अपनी ज़िन्दगी जीना चाहता है. खुश रहना चाहता है, लेकिन कई ऐसी लाइलाज बीमारियों के कारण अगर कोई व्यक्ति अपनी कष्टपूर्ण ज़िन्दगी छोड़कर मौत की गोद में सोने की इजाज़त मांगे तो यह बहुत ही चिंतित करने वाला विषय बन जाता है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं मर्सी किलिंग या इच्छा-मृत्यु की.

इच्छा-मृत्यु एक बहुत ही संवेदनशीन मुद्दा है जिसकी मांग दुनियाभर में बढ़ी है. इस मुद्दे से कानून के साथ-साथ मेडिकल और सामाजिक पहलू भी जुड़े हुए हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे विशाल देश में  इच्छा-मृत्यु को वैधानिक स्वीकृति मिलनी चाहिए?

व्यक्ति की मृत्यु के अधिकार से जुड़ा है इच्छा-मृत्यु. किसी असाध्य और लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए डॉक्टर की सहायता से उसकी ज़िन्दगी का अंत करने को इच्छा-मृत्यु कहते हैं.

मरीज़ की मन्ज़ूरी के बाद ऐसी दवाइयां दी जाएं या आहार नली को हटा लिया जाए जिससे मरीज़ की मौत हो जाए, यह संसार के कुछ देशों जैसे- नीदरलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड और अमेरिका के ओरेगन राज्य में कानूनी रूप से मान्य है, वहीं दूसरी ओर ऐसे मरीज़ जो मौत की मन्ज़ूरी देने में असमर्थ हों, उन्हें मारने के लिए दवाइयां देना यह भारत सहित दुनिया के कई देशों में ग़ैरकानूनी माना गया है और अपराध भी.

अमेरिकी महिला टेरी शियावो (Terri Schiavo) के मामले ने इस मुद्दे को दुनियाभर में गरमा दिया था. इस महिला को 1990 में दिल का दौरा पड़ा था. उसके बाद से उसका दिमाग़ सुन्न रहा. टेरी की मृत्यु को लेकर सात साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी गई.

एक ओर  टेरी के पति चाहते थे कि उनकी पत्नी को इस कष्टपूर्ण ज़िन्दगी से मुक्ति मिले, लेकिन दूसरी ओर टेरी के पिता अपनी बेटी को जीवित रखना चाहते थे. अदालत की मंजूरी मिलनें के बाद टेरी की आहार नली को हटा दिया गया. 41 साल की उम्र में टेरी शियावो चल बसीं.

टेरी शियावो के मामले पर  बहस विश्व के हर देश में होने लगी जिससे भारत भी नहीं बच पाया. यहाँ भी कई  ऐसे मामले सामने आए हैं  जैसे- अरुणा शानबाग मामला. नर्स रहीं अरुणा मुम्बई के एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में स्टाफ के ही एक सदस्य नें अरुणा पर हमला कर उनके साथ दुराचार किया जिसके कारण वह कोमा में चली गईं. इसके बाद अरुणा की सहेली द्वारा 2011 में अरुणा के लिए दया-मृत्यु की मांग की गई थी.

लेकिन ऐसे गम्भीर मामलों से निपटने के लिए अभी तक भारत में कोई भी ऐसा कानून नहीं बना है और न ही इसे मान्यता दी गयी है. भारत में मर्सी किलिंग  एक अपराध माना गया है. अगर  डॉक्टर ऐसा करने की कोशिश भी करता है तो वह भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की धारा 304 के अंतर्गत हत्या का अपराध माना जाएगा.

सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि देश के कानून के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को मरने की अनुमति नहीं दी जा सकती है. भारत में यह पूरी तरह गैर-कानूनी माना गया है.

भारत में किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को  इच्छा-मृत्यु की इजाज़त नहीं है क्योंकि भारतीय संस्कृति में हमेशा से ही जीवनकी रक्षा करने की परंपरा रही है और यह मानवधिकार के ख़िलाफ भी है. सोचने वाली बात यह है कि अगर आप किसी को ज़िन्दगी नहीं दे सकते तो उसकी जान लेने का अधिकार कैसे मिल सकता है.

इतने विचार विमर्श के बावजूद  भारत में इच्छा-मृत्यु  की वैधानिकता पर अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है. इसलिए सरकार को इस मुद्दे पर और अधिक बहस करने की ज़रूरत है ताकि इस गम्भीर समस्या का समाधान किया जा सके. इस बारे में आपकी क्या राय है भारत में इच्छा-मृत्यु को लागू करना क्या सही क़दम हैक्या इस कानून के बनने से इसका दुरुपयोग नहीं होगा ?

 

Ruby Shaheen

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