माँ तेरे आँचल से दूर हुआ तो बेज़ार हो गया मैं

By Juhi Jha Prasar Rahi
गुलों के बीच से जो उठा तो ख़ार हो गया मैं
माँ तेरे आँचल से दूर हुआ तो बेज़ार हो गया मैं
 
हुनर अक़्ल और लेखनी को वक़्त देता भी तो कहाँ से
घर और दफ़्तर की भागम भाग में ही बेकार हो गया मैं
 
किसी ने ऐसे देखा तो किसी ने वैसे मगर रास ना आया
नुमाइशें पूरी करते करते बेहतरी का बाज़ार हो गया मैं
 
और दर्द दिल का उतरता नहीं था कभी आँखों में
तेरा साथ जो छुटा शक्ल से भी बीमार हो गया मैं
 
जैसे जब हालात वैसे ही हाव भाव रख लेता हूँ अब
राही पराये देश में हिंदुस्तानी कोई अखबार हो गया मैं

जूही झा परासर ‘राही’

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