वो लाडली की लाडली थी

वो लाडली की लाडली थी

वो लाडली की लाडली थी, पर वो बेटी थी

वो हाँथ ही था
कुचला सा वो पुतला, सड़क के किनारे, कूड़े के ढेर में
वो हाँथ ही था
थीं अंगुलियाँ बराबर, अंगूठा भी साथ था
वो हाँथ ही था

साहस न था उठा कर उसे देखने का
अहसास एक डरा सा खोयी सी ज़िन्दगी का
कुछ कूड़े की घिन थी, कुछ अवसाद ह्रदय का
पर वो हाँथ ही था

हाँथ था और अंगूठा भी तो शायद धड  भी होता, सर भी होता
आँखें भी होतीं और कान भी
नाक भी और टांग भी
छुपा सा वो जीव, एक खुला सा सच कह रहा था
ये न पूछो क्या था

पूछना क्या है ?
वो एक भ्रूण था
अविकसित, तिरस्कृत, अधुरा,  पछताता हुआ
कह रहा था अपनी कहानी बंद वाणी से
बेटी जो थी ! ठुकरा दिया

आस थी एक लाडले की
लाडली ने दस्तक जो दी, भगा दिया
पर वो कोई और नहीं एक लाडली ही थी
अपने ही शरीर को आत्मा के वास से मना किया
चाहती वो भी थी, मोह था, पीड़ा भी सही थी
पर भय था

भय था पोषण का, लालन पालन का, दहेज़ का
भय था मन का, सम्मान का
कुछ दबाव था आस पास का
चाहती थी अपनी मुस्कराहट को उसकी किल्करिओं में पाना
चाहती वो भी थी उसको दुल्हन बनाना
चाहती  वो भी थी उसके घर को सजाना
पर डरती थी
निराश थी

बिना विस्वास थी
उसने आडम्बर समाज का देखा था
इस लिए गिरा दिया उसको
कूड़े के ढेर में दबा दिया उसको
फिर भी वो बेटी उसकी उससे कुछ कहती थी
कभी बाग़ में, कभी स्वप्न में

दूजे रूप लेकर वो आती थी
कभी मुस्कुराती थी, कभी मुंह बनती थी
हर बार टीस एक उसके दिल पर छोड़ जाती थी
वो लाडली की लाडली थी, पर वो बेटी थी.

Khalid Jamal Ansari IIT, Kharagpur
Khalid Jamal Ansari, IIT, Kharagpur

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