क्यों पसंद करते हैं आज के युवा सआदत हसन ‘मंटो’ को ?

सआदत हसन ‘मंटो’ ये नाम सुनते ही ज़हन में ‘खोल दो’ और ‘ठंडा’ गोश्त’ जैसे नाम घूमने लगते हैं. ‘लाइसेंस’ या ‘सरकंडों के पीछे’ जैसी कहानियां बरबस याद आ जाती हैं.

वर्तमान में खासे लोकप्रिय ‘मंटो’ 1912 में लुधियाना के समराला में पैदा हुऐ थे. अलीगढ़ में तालीम हासिल करने के बाद मंटो लाहौर, अमृतसर और दिल्ली में रहते हुए आख़िर में मुम्बई पहुंच गये.

जहां के.आर. आसिफ के साथ मुग़ले आज़म लिखने की बात चली लेकिन इस बातचीत को दो मुल्कों के बंटवारे का दर्द निग़ल गया. बंटवारे के वक़्त के गर्भवती औरतों के फ़टते पेट, पसीने उगलते जिस्म और दूध की तलाश में खून उगलते मासूमों के साये सआदत हसन के दिलो दिमाग़ पर काले जादू से ठहर गये. जिसके बाद उर्दू अदब कि दुनिया नें सआदत हसन के अन्दर का मंटो देखा. वो मंटो जो शराब की एक बोतल के बदले एक अफ़साना नीलाम किया करता था.

महज़ सात साल के मंटो ने जलियांवाला बाग पर अफ़साना ‘तमाशा’ लिखा जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के ज़ुल्मों सितम का सपाट बयान और विद्रोह झलकता था. उनकी ज़्यादातर कहानियां सांप्रदायिकता, बंटवारा और दंगों के दरमियान वाले नंगे सच पर लिखी गईं, जिसके लिये उनपर मुकदमे भी चले.

टोबा टेक सिंह, काली शलवार, बिजली पहलवान, ऊपर-नीचे और दरमियां जैसे शीर्षकों वाली उनकी कहानियों में समाज से नाराज़गी और लिखने की बेबाकी नज़र आती है. वह बेबाकी जिसे समाज पढ़ना तो चाहता है लेकिन उसे अपने अन्दर उतारना नाकाबिले बर्दाश्त समझता है.

समाज़ ने मंटो को जीते जी कभी अपने लायक नहीं समझा. उनपर हमेशा अश्लीलता और समाज को भ्रष्ट करने के इल्ज़ाम लगते रहे, लेकिन मंटो ने कभी इससे कोई परेशानी नहीं महसूस की. मंटो ने समाज के ठेकेदारों और पाखंडियों को अपनी कलमी बन्दूक का हमेशा निशाना बनाये रखा.

आज उनकी कहानियों को पढ़कर युवा मंटो को समझने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि मंटो की कहानियों का ‘सेक्स’ ज़्यादातर युवा वर्ग को रिझाता है, जिसको नौजवान तबका चटख़ारे लेकर पढ़ता है लेकिन मंटो के अफसानों के पीछे छिपे राज़ों से वाक़िफ हुए बग़ैर आज मंटो को पढ़ना युवाओं में बुद्धिजीवी होने का ज़रिया बन गया है. हालांकि मंटो की कहानियों का असली मतलब समझने वाले उनमें से दो चार ही होंगे.

मंटो ने अपनी ‘बदनाम’ कहानियों में जिन हालातों को उकेरा था वो आज के समय में प्रासंगिक लगते हैं. मंटो ने उस ज़माने के अपने कड़वे अनुभवों जैसे -देह व्यापार इत्यादि को जिस ख़ूबसूरत ‘बदसूरती’ के अंदाज़ से अपनी कहानियों में लिखा है ठीक उसी प्रकार का अनुभव मंटो को पढ़ने वाले अपने आस पास के माहौल में देखते हैं. मंटो ने अपनी कहानियों में धर्म के पाखंड को भी निशाने पर रखा. उनकी कहानी ‘करामात’ में भी इसकी झलक दिखाई पड़ती है.

Zubair Alam

Zubair Alam

 

1 Response

  1. बहुत खूब ज़ुबैर साहब ! अल्लाह आपको हर मुकाम पर क़ामयाबी दे ।

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