महिलाओं की शिक्षा- कितनी हकीक़त कितना फ़साना

महिलाओं की शिक्षा- कितनी हकीक़त कितना फ़साना

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था,

“किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम मापदण्ड है उस राष्ट्र की महिलाओं की स्थिति”

भारत एक प्रगतिशील राष्ट्र है जो दिन-प्रतिदिन प्रत्येक क्षेत्र में संसाधन प्राप्तिकरण में धनी होता जा रहा है, जिसमें शिक्षा की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है, परन्तु भारतीय संविधान में वर्णित अनुच्छेद (21-A) के तहत देश में रहने वाले सभी नागरिकों को समान रूप से शिक्षा का अधिकार प्राप्त है. लेकिन इस अधिकार के बाद भी महिलाएं शिक्षा से वंचित नज़र आती हैं.

प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान युग तक महिलाओं की स्थिति शिक्षा के क्षेत्र में चिंता का विषय रही है. पारिवारिक समस्या, जटिल व नकारात्मक मानसिकता और पुरुष प्रधान संरचना के कारण वह पहले भी इस अमूल्य रत्न से वंचित थीं और आज भी हैं. इसके विपरीत अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया जैसे सभी विकसित देशों में महिलाओं को समान स्थान व अधिकार प्राप्त हैं.

  शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कुछ समाज-सुधारकों जैसे- राजा राम मोहन राय,सर सय्यद अहमद खान, ज्योतिषा फुले और महात्मा गांधी  ने कई कठोर क़दम उठाए किंतु स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं है. शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की शैक्षणिक दर ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा उच्च है, परन्तु यह अनुपात भी पुरुषों की तुलना में कम है.

2011 की जनगणना के अनुसार भारत का साक्षरता अनुपात 74% है, जिसमें पुरुषों की साक्षरता दर लगभग 87% और महिलाओं की साक्षरता दर केवल 62% है.

संयुक्त राष्ट्र’ द्वारा निर्मित “संयुक्त राष्ट्र शिक्षा विज्ञान और संस्कृति संगठन“ अर्थात यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में कुछ देश ऐसे भी हैं जहां शिक्षा के अधिकार के प्रति महिलाओं में अत्यधिक जागरुकता का विस्तार है.“अर्जेंटीना” में महिला साक्षरता दर 98.1% है, जबकि पुरुष साक्षरता दर  98% है.

“डोमिनिकन रिपब्लिक” में महिला साक्षरता दर 92.3% जबकि पुरुष 91% साक्षर हैं. यह अनुपात सम्पन्न राष्ट्रों में महिलाओं की शिक्षा की प्राथमिकता को दर्शाता है. जबकि भारत की स्थिति अत्यधिक चिंताजनक है. मानव सूचकांक में भी भारत को शिक्षित नागरिकों की सूची में 131वें स्थान पर रखा गया है.

इस असमानता को दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र नें “मिलेनियम डवेलप्मेंट गोल” “संस्टेनेबल डवेलपमेंट गोल“, जैसी योजनाएं बनाई हैं. इसके अलावा भारत सरकार भी “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, “कस्तूरबा बालिका विद्धयालय योजना” “राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान” आदि का क्रियान्वयन कर रही है जिसके द्वारा महिलाओं की स्थिति शिक्षा के क्षेत्र में सशक्त हो सके. 

‘यूनेस्को’ भी प्रतिवर्ष “अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस” का आयोजन करता है, और लोगों में शिक्षा के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए भिन्न-भिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करता है. इसका उद्देश्य पूर्ण साक्षरता और लैंगिक असमानता के प्रति लोगों में चेतना जगाना है.

परन्तु खेद यह है कि जहाँ एक ओर “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाओं के द्वारा रोज़गार के नए-नए अवसर प्रदान किए जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षा के अभाव के कारण महिलाएं इन अवसरों का पूरी तरह लाभ नहीं उठा पा रही हैं.

शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति में बदलाव के लिए सरकार के साथ-साथ समाज का भी प्रयत्नशील होना आवश्यक है. एकजुट होकर ही इस समस्या का समाधान सम्भव है. महिलायें भी अपने अधिकारों को लेकर सजग हों और रूढ़ीवादी परम्परा को तोड़कर आगे आएं और शिक्षा की जलती हुई जोत से अपना जीवन रोशन करें. नेल्सन मंडेला ने भी कहा था, “शिक्षा एक ऐसा शक्तिशाली शस्त्र है जिसके द्वारा आप दुनिया बदल सकते हैं”.

Neha Thakur

 

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